Sunday, February 28, 2010

आँखों की ज़बान....



ना जाने कितना दर्द है इन आँखों में,
कि सारी कायनात है डूबी इन आँखों में...
कभी खुशियों का सागर तो कभी,
ग़मों का सैलाब है उमड़ता इन आँखों में....
कभी नीले आसमान सी रंगत तो कभी,
सेहरा सी प्यास है बसी इन आँखों में....
कभी झरने सी शोख चंचल तो कभी....
रेगीस्तान सी वीरानी है इन आँखों में....
कितने ही पड़ाव आये है राहों में,
मगर ना जाने किसका है इंतज़ार इन आँखों में....
ये आँखे जो कभी बोलती है तो कभी,
खामोश रहकर भी सारे राज़ खोलती हैं...
कौन जाने कितने ही अनकहे सवाल छुपे है इन आँखों में....




Monday, February 22, 2010

उन्ही के होते चले गए....




ना जाने कौन सी कशिश थी, उन निगाहों में....
के हम बिन डोर ही खींचे चले गए..
खुद को भी भुला दिया हमने,
और उन्ही के होते चले गए....

अपना सा एहसास लिए,
वो आये एक झोके की तरह...
और हम एक टूटे पत्ते की तरह,
बस हवा में उड़ते चले गए....

उनके प्यार में ऐसे खोये,
की सारी ख़ुशी उनके सदके लुटाते चले गए....
शायद कम पड़े इस उम्र की खुशियाँ सारी,
इसलिए अगले जनम की खुशियाँ भी उनके नाम करते चले गए....

कभी भी ना दे खुदा उन्हें एक अश्क का कतरा भी,
इसी शर्त पर हम अपनी ज़िन्दगी उन पर फनाह करते चले गए...

Saturday, February 20, 2010

अश्कों की ज़बान....



दिल का हाल ये अश्क बताते हैं....
जो अनजाने में आ ही जाते हैं...
कहते हैं अश्कों की ज़ुबान नहीं होती....
मगर ये अनकही भी सुनाते हैं....
सीने में उठी है टीस अभी...
सुना है ये अश्क हे इन्हें सहलाते है...
जब तुम्हे दर्द हो तो ये हमारी आँखों में क्यों आते हैं...
तन्हाई में ये ही सच्चे साथी है...
इसलिए तो ये बिन बुलाये ही चले आते हैं....

Monday, February 15, 2010

मुझे तेरा साथ चाहिये......






ऐ मेरे हम सफ़र मुझे तेरा हाथ चाहिये,
जो कभी न ख़त्म हो ऐसा साथ चाहिये...
जिंदगी की राहों में जब मैं आगे बढ़ू,
तो मुझे तेरा साया दिन रात चाहिये...
कभी बिछड़ जाये राहों में गर,
तो कभी न ख़त्म हो वो आस चाहिये...
ज़िन्दगी की खुशियों में तो, कई हमराह मिलेंगे,
जो हर पल साए की तरह दिन रात रहेंगे....
पर मुझे गम के घने अंधेरो में,
तेरा ही साथ चाहिये...
मिलता है समुन्दर में जैसे मोती को सीपी का सहारा,
एक ऐसे ही रिश्ते की तुझसे सौगात चाहिये...
रहती है चांदनी जिस तरह चाँद के आस पास,
उसी तरह मुझे तेरा एहसास चाहिये...
ऐ मेरे हम सफ़र मुझे तेरा ही साथ चाहिये...

Wednesday, February 10, 2010

मैं जीना चाहती हूँ.....



थाम लो मुझे, अब के गयी तो लौट ना पाउंगी,
राह के अंगारों में, मैं जल ही ....
किस्मत से है पाया साथ तुम्हारा, पर अब के टूटी तो जुड़ ना पाउंगी...
दिल ने की है आरज़ू , मिले हैं सपनो को नए पंख...
अरमा है जाऊं गगन के उस पार....
पर डरती हूँ कहीं, ये पंख मेरे झुलस के ना रह जाए राहों की तपीश से...
उलझ के ना रह जाए मेरे पाँव रिश्तो की जंजीरों से...
अब के जंजीरों में जकड़ी तो, शायद तोड़ ना पाउंगी..
लाख कर लू कोशिश, लौट के ना आ पाऊँगी...
लोग तो होंगे जो हमें जुदा करेंगे, रिश्ते और नातों की दीवारों में...
मुझे बंद कर के रखेंगे, थाम लो थम लो मुझे...
वर्ना मैं घुट के ही मर जाउंगी...
अब के गयी तो फिर लौट ना पाऊँगी...
रह जाएँगी अधूरी मेरी ख्वाहिशें, टूट के बिखर जायेंगे मेरे सपने..
उन सपनो में सिर्फ दर्द होगा तुमसे बिछड़ने का..
गम होगा तो तुम्हारे साथ ना चल पाने का,
जिन राहों पे हमने खायी थी कसमे साथ जीने मरने की..
थाम लो - थाम लो मुझे मैं जीना चाहती हूँ...
तुम्हारी हम राह बनाना चाहती हूँ ...
थाम लो वरना मैं तड़प के मर ही जाउंगी...
अब के गयी तो लौट के ना आ पाउंगी...


Monday, February 8, 2010

ज़िन्दगी...तू डराती क्यों है...??....



हर रोज हम खुद से इक सवाल किया करते हैं, आखिर हम क्यों जिया करते हैं.... लेकिन हर बार ये सवाल मेरे ही अक्स से टकरा कर वापस चला आता हैं.... हर बार की तरह रोज़ ये सोचते हैं कि बस..... अब कुछ और नहीं पूछना इस ज़िन्दगी से.....लेकिन ये बेरहम ज़िन्दगी हमें हर दिन एक नए मोड़ पर ला खड़ा करती है....और फिर मै उसका दमन थाम पूछती हूँ बता क्यों नहीं रहम करती है तू मुझ पर .... क्या सारे इम्तेहान मेरे लिए ही संभाल कर रखे हैं.... इन सारे सवालों के साथ मैं एक बार फिर अकेली हो जाती हूँ.... और ज़िन्दगी फिर मुझे तन्हा कर कहीं दूर निकल जाती है.. किसी कोने में ताकि वो देख सके कि मै किस राह जा रही हूँ.... जिस से फिर वो दुबारा मुझे आसानी से ढूंड ले और अपने साथ बहा ले जाए.....

मेरी अगली कविता इस ज़िन्दगी के उपर लिखी है....

मुझको ऐ ज़िन्दगी हर वक़्त सताती क्यों है....
जुल्म तू अपने दामन के मुझपर ढाती क्यों है....

कभी मिला नहीं सुख चैन मुझको जिने का....
रो चुके हम इतना अब और रुलाती क्यों है....

क्यों रहम नहीं आता तुझको मेरे हालात पर....
सुला दे मुझे, दिन रात जगती क्यों है....

फ़ना हुए हैं जो तुझे प्यार करते हैं.....
मौत को आने दे....
तू उसे डरती क्यों है...

Sunday, February 7, 2010

इंतजार... कभी न ख़त्म होने वाला....







ज़िन्दगी यू हुई बसर तन्हा...........
काफ़िला साथ था और सफर तन्हा.....

हम हमेशा ये क्यों सोचते है की इस ज़िन्दगी में कोई तो हो जिसके कांधे हमारे लिए हमेशा तैयार रहे जब हम उदास हो या इस ज़िन्दगी के दौड़ में भागते भागते थक गए हो.... कोई ये क्यों नहीं सोचता की हर पल क्यों हमारे लिए कोई रहे, जो अपनी खुद की ज़िन्दगी से कुछ पल हमारे लिए निकाले. जब हम उदास हो या थक गाये हो इस दौड़ धुप से भरी ज़िन्दगी से....
क्यों हमे किसी का साथ चाहिए होता है.. क्यों हमें हर पल किसी की तलाश रहती है, जब किसी को हमारी तलाश नहीं रहती तो क्यों हम किसी की तलाश में भटकते हैं...... क्यों हम किसी का इंतजार किया करते है.... आख़िर क्यों होता है हमें किसी का ऐसा इंतज़ार जेहता है, जो कभी ख़त्म ही नहीं होता......


शायद हर किसी को किसी का इंतज़ार रहता है.... ये कविता उनके लीए है जो आज भी किसी का इंतज़ार कर रहे है......
करीब हो मेरे पर है मुझे क्यों तुम्हारे पास आने का इंतजार....
तुम्हारे साँसों की खबर है मुझे पर फिर भी है मुझे तुम्हारे छु जाने का इंतजार....

यू तो है मेरा तुम्हारा रिश्ता सागर से भी गहरा....
पर ना जाने है क्यों तुममे समां जाने का इंतज़ार....

मंज़िल पे खड़ी हूं हाथ बढ़ाये किस्मत भी मेरे आगे सर झुकाए....
पर ना जाने है क्यों हर पल किसी के आने का इंतज़ार...

वो ही जो मेरी मंज़िल है वो ही जो मेरा हमसफर है....
कर रही हूं उसके करीब आने का इंतज़ार....

हर पल बस एक पल का है इंतज़ार....
के वो कब आये और मुझमे समां जाए...
कर रही है मेरी आँखे उसमे गुम होने का इंतज़ार....

हर पल हर घड़ी है बस इंतज़ार..........
अब तो कर रही है मेरी रूह .....
इस इंतज़ार के खत्म होने का इंतज़ार.........