Saturday, September 18, 2010

एक बार मुस्कुराना चाहती हूँ...


वक्त को आज अपनी मुट्ठी में कैद कर लेना चाहती हूँ...
आज मैं हर लम्हा जी भर के जी लेना चाहती हूँ....
न की कभी कोई ख्वाहिश किसी से....
अब ख्वहिशों का पुलिंदा बनाना चाहती हूँ....
कि आज फिर एक बार मुस्कुराना चाहती हूँ...

जिन राहों पर चलते हुए डगमगाए थे कदम मेरे....
अब उन राहों से फिर एक बार गुजरना चाहती हूँ....
वक़्त की लहरों ने कई थपेड़े दिए....
लेकिन आज उन्ही लहरों को मात देना चाहती हूँ...
कि आज फिर एक बार मुस्कुराना चाहती हूँ...

जिन राहो में चलते हुए कई नकश्तर चुभे है....
हुआ है छलनी मेरा दिल भी....
लेकिन आज उन्ही ज़ख्मो के साथ....
वक़्त को मरहम लगाना चाहती हूँ....
कि आज फिर एक बार मुस्कुराना चाहती हूँ...

कई बार लड़ी थी मैं आसमां से....
कई बार रोना आया था मुझे मेरे हालत पर....
लेकिन आज इसका सिंदूरी रंग देख....
इसी के रंग में रंगना चाहती हूँ.....
कि आज फिर एक बार मुस्कुराना चाहती हूँ...

आज फिर तेरी याद आई है...
उन लम्हों की कसक को अपने साथ लायी है...
आज मै उन्हें याद कर रोना नहीं...
खिलखिलाना चाहती हूँ....
कि आज फिर एक बार मुस्कुराना चाहती हूँ...