Saturday, December 10, 2011

कांपती मेरी परछाई है...


आईने में आज खुद को देखा करते हैंतलाशते हैं वजूद अपनासोचते हैं कि चाहत आज कहां ले आई है...जहां दूर तक साथ बस तनहाई है...
नहीं पता था सपने रेत का कतरा हैंकभी भी किसी के हाथ नहीं आते...जो चल पड़ा है मेरे साथ वोअपना है या अंजान परछाई ...
खुशियां ही चाहती है जिंदगीपर करनी पड़ती है गम की बंदगीरौशनी की तलाश में निकली हूं जब कभी...क्यों मेरे साथ अंधेरों की राहजनी है...
आज कई पन्नों को पलटा मैंनेहर पन्ना एक नई कहानी बताता है..किस जगह पर आकर रूके हैं कदम मेरेजहां दूर तक बस मेरी ही रूसवाई है..
नहीं जानते थे कि दर्द फिर सहना होगाशर्तों के साथ हर मोड़ पर बढ़ना होगा...किश्तों में खत्म हो रही है ज़िंदगी किसी की...सिसकती है रूह और कांपती मेरी परछाई है...

Thursday, April 21, 2011

ये बातें...






कितनी सारी बातें है जो हम कहना चाहतें हैं...

कितनी सारी बातें है जो हम सुनना चाहतें हैं...


इन्ही सारी बातों के बिच एक ज़िन्दगी है....

जिसे बातों के साथ ही हम बुनना चाहते हैं...


कभी तो ये बातें अनकही बनकर एक ख्वाब की तरह ....

तो कभी तूफां की तरह किसी की ज़िन्दगी बहा कर ले जाती है...


बातें कभी मरहम बनती हैं...किसी की दुखती रगो पर....

तो कभी नक्श्तर बन दिल की गहरायियो में समां जाती हैं...


कभी तो ये बातें ही किसी के जीने का सहारा बनती हैं....

तो फिर कभी उसी पल में ज़िन्दगी के बिखर जाने का बहाना बनती है....


एक पल में किसी के लिए ख़ुशी है तो

किसी के लिए कभी ना ख़त्म होने वाला गम है ये बातें...

फिर क्यों ऐसा होता है अक्सर....

कही अनकही बातों के बिच ज़िन्दगी को एक अनसुलझा सवाल बना देती हैं...ये बातें...

Saturday, March 26, 2011

एक बार ज़िन्दगी...



मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी...
किसी को तेरी बहुत जरुरत है....
हर पल सिसकता है कोई....
तेरे हर नाज़ उठाने के लिए....
हर पल तड़पना क्या होता है...
आ तू भी देख मेरी आँखों से ज़िन्दगी....
मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी...

ऐसा नहीं कि तुझसे चाहत नहीं है मुझे....
लेकिन सिर्फ चाहते ही हैं जो मजबूर करती हैं...
कुछ ना पाने कि टीस को नासूर करती हैं....
नहीं है मुझमे अब इतनी हिम्मत बाकी....
हर लम्हा गुजरता जा रहा है...
कहीं ऐसा ना हो कि ख़त्म हो जाए तुझे पाने कि आस ज़िन्दगी....
मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी....

हर साँसे तेरे आने कि आस में आती हैं...
उम्मीद भी उन्ही साँसों के साथ ख़त्म हो जाती है...
कही ऐसा ना हो... कि किसी के अरमान सीने में हे दफ़न हो जाएँ...
क्यों नहीं आता रहम तुझे किसी कि सिसकियों पर...
कहीं ऐसा ना हो कि टूट जाए तुझपर से किसी का ऐतबार ज़िन्दगी...
मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी...
मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी...



Monday, March 7, 2011

कैसा ये सम्मान...



हर रोज़ नारी को अपमान का घूंट पीना पड़ता है....
एक स्त्री होने का कहर सहना पड़ता है..
कभी बेटी के रूप में...जिम्मेदार बन खुदके अरमानों का गला घोटा है....तो माँ के रूप में खुद को ही भुला बैठती है....हर मोड़ पर एक ऑरत होना ही उसके सपनो का ही दुश्मन बना है....जिम्मदारी का लिहाफ ओढ़े जब बेटी दूसरे घर जाती है...तो उसे वो स्वर्ग बनती है...मगर हर पल उसका दिल अपने पन को तरसता है....बस कहने को ही बहु और बेटी एक सामान है....जब वो पंख फैला अपने सपनों को पूरा करना चाहती है....तो उसके पंख क़तर दिया जाते हैं...आज सारा समाज यही कहता है....लड़का लड़की में आज फर्क कहाँ हैं....लेकिन हकीकत को जानता हर इंसान है....हर कदम पे रिश्ते, नाते, रस्मों कि जंजीरों में हमें ही जकड़ा जाता है...परिवार की शान के नाम पे हमारा ही गला घोटा जाता है...कभी दहेज़ तो कभी नफरतों कि आग में कई बार झुलसाई गयी हैं...हमने जब अपना नाम आसमान में लिख दिया है
फिर क्यों हम .. हर मोड़ पर सताई गयी हैं....
हर कदम पे हमें मजबूर किया हैं... हमारे पैरो को जकड़ दिया है....
जब हमारे कदम बढे भी हैं तो....उनके हौसलों को वहीं पस्त किया गया है....हमारा जब कोई वजूद ही नहीं था तो फिर क्यों ?
हर
पल दधकती आग में जलने को पैदा किया....क्यों आखिर क्यों हमें पैदा किया?????






Friday, February 25, 2011

कैसी ये ज़िन्दगी है...


कैसी ये ज़िन्दगी है...
हर तरफ बस आंसुओं की नमी है....
बेपरवाफ होकर जीना हम भी चाहते हैं....
लेकिन हर जगह तेरी यादों की राहजनी है...

जिन राहों पे हम संग चला करते थे....
न जाने क्यों उन राहों पर आज वक्त की साँसे थमी हैं....
इन आँखों को है इंतज़ार तेरा...
हर सांस लेती है नाम तेरा...
पर क्यों आज मेरी किस्मत में तेरी कमी है...

चाहतों का ताना बाना हमने बुना था...
अपने ख़्वाबों को हमने खुद ही चुना था....
फिर क्यों आज खुद के फैसलों पर ऐसी बेबसी है....
कि मायूस है हम और हर लम्हा रुलाती ये ज़िन्दगी है...

वक़्त हर पल एक नये सवाल खड़े कर देता है....
किसी को खुशियों से बेजार कर देता है....
फिर क्यों हम इसके पीछे भागते रहते हैं....
जबकि हमारे हर सपनों को ख़ाक में मिलाती ये ज़िन्दगी है...







Saturday, February 5, 2011

गुजारनी ये ज़िन्दगी है.....





आँखों में मेरे एक ही मंजर है...
दूर तक फैला रेत का समन्दर है...

कभी तो मिलेगी मुझसे ज़िन्दगी मेरी...
बस इस उम्मीद पे ही इस ज़िन्दगी की शम्मा रौशन है...

चार दिन कि ज़िन्दगी है अपनी...
और कांटो भरा सफ़र है....

कतरे कतरे में गुज़र रही है ज़िन्दगी अब तो....
और हर लम्हा गुजरता है ऐसे जैसे एक सदी है...

कट रही है ज़िन्दगी कुछ इस तरह...
जैसे कोई उम्मीद हो जीने की....

हम बन गए है गुनाहगार और
सजा में गुजारनी ये ज़िन्दगी है.....