Saturday, March 26, 2011

एक बार ज़िन्दगी...



मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी...
किसी को तेरी बहुत जरुरत है....
हर पल सिसकता है कोई....
तेरे हर नाज़ उठाने के लिए....
हर पल तड़पना क्या होता है...
आ तू भी देख मेरी आँखों से ज़िन्दगी....
मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी...

ऐसा नहीं कि तुझसे चाहत नहीं है मुझे....
लेकिन सिर्फ चाहते ही हैं जो मजबूर करती हैं...
कुछ ना पाने कि टीस को नासूर करती हैं....
नहीं है मुझमे अब इतनी हिम्मत बाकी....
हर लम्हा गुजरता जा रहा है...
कहीं ऐसा ना हो कि ख़त्म हो जाए तुझे पाने कि आस ज़िन्दगी....
मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी....

हर साँसे तेरे आने कि आस में आती हैं...
उम्मीद भी उन्ही साँसों के साथ ख़त्म हो जाती है...
कही ऐसा ना हो... कि किसी के अरमान सीने में हे दफ़न हो जाएँ...
क्यों नहीं आता रहम तुझे किसी कि सिसकियों पर...
कहीं ऐसा ना हो कि टूट जाए तुझपर से किसी का ऐतबार ज़िन्दगी...
मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी...
मेरे घर भी आना तू एक बार ज़िन्दगी...



4 comments:

  1. जिन्दगी तो आप के साथ ही है..
    थोडा ध्यान से देखें मिल ही जाएगी...आस नहीं टूटने पायेगी..
    लिखते रहें.. सुन्दर

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  2. हर साँसे तेरे आने कि आस में आती हैं...
    उम्मीद भी उन्ही साँसों के साथ ख़त्म हो जाती है.

    शानदार गजल

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  3. tumhari har kavitao me dard kyo hai??
    kuch aisa bhi likho jisse lage ki bahut khus ho bahut... jaise tumne zindagi bhar jise chaha aur vo tumhe mil nahi sakta lekin vo tumhe mil gaya ..aur tum khusi se pagal ho...

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