Monday, March 7, 2011

कैसा ये सम्मान...



हर रोज़ नारी को अपमान का घूंट पीना पड़ता है....
एक स्त्री होने का कहर सहना पड़ता है..
कभी बेटी के रूप में...जिम्मेदार बन खुदके अरमानों का गला घोटा है....तो माँ के रूप में खुद को ही भुला बैठती है....हर मोड़ पर एक ऑरत होना ही उसके सपनो का ही दुश्मन बना है....जिम्मदारी का लिहाफ ओढ़े जब बेटी दूसरे घर जाती है...तो उसे वो स्वर्ग बनती है...मगर हर पल उसका दिल अपने पन को तरसता है....बस कहने को ही बहु और बेटी एक सामान है....जब वो पंख फैला अपने सपनों को पूरा करना चाहती है....तो उसके पंख क़तर दिया जाते हैं...आज सारा समाज यही कहता है....लड़का लड़की में आज फर्क कहाँ हैं....लेकिन हकीकत को जानता हर इंसान है....हर कदम पे रिश्ते, नाते, रस्मों कि जंजीरों में हमें ही जकड़ा जाता है...परिवार की शान के नाम पे हमारा ही गला घोटा जाता है...कभी दहेज़ तो कभी नफरतों कि आग में कई बार झुलसाई गयी हैं...हमने जब अपना नाम आसमान में लिख दिया है
फिर क्यों हम .. हर मोड़ पर सताई गयी हैं....
हर कदम पे हमें मजबूर किया हैं... हमारे पैरो को जकड़ दिया है....
जब हमारे कदम बढे भी हैं तो....उनके हौसलों को वहीं पस्त किया गया है....हमारा जब कोई वजूद ही नहीं था तो फिर क्यों ?
हर
पल दधकती आग में जलने को पैदा किया....क्यों आखिर क्यों हमें पैदा किया?????






1 comment:

  1. beti ki vyatha ka accha chitran kiya hai aap ne..
    iswar aap ko anwarat likhne ka sambal de..

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