Monday, August 30, 2010

कौन सी राह है ज़िन्दगी......???


ये कौन सी राह है ज़िन्दगी...
तू ही बता तुझे है जाना कहाँ ज़िन्दगी....
लुट गया जो एक खुबसूरत सा आशियाना था तेरा....
अब तू ही बता कहाँ है तेरा ठिकाना ज़िन्दगी....

क्या वो तेरे साथ चल पायेगा....
जिसके साथ तुझे है बसाना ज़िन्दगी...
वो कलियाँ तेरे गुलशन कहाँ गयी....
जिससे तू हुआ करती थी गुलज़ार ज़िन्दगी....

तेरे दामन कि खुशियाँ तुने ही लुटाई है....
अब क्यों है तू एक कब्रगाह सी ज़िन्दगी....
अब वो सितारे भी हँसा करते है तुझपे....
जो सजा करते थे कभी तेरे दामन पे ज़िन्दगी...

चलते-चलते धुंधला गए रस्ते सारे...
अब तू बता कहाँ है तेरा हमराह ज़िन्दगी...
करीब आकर भी तू दरिया के....
क्यों है प्यार से तू बेज़ार ज़िन्दगी....

वो जो तेरा साया तुझसे लिपटेगा...
वो ही तेरे छुवन को तरसेगा ....
क्यों कि होगी ना सुबह उस रात की ...
जिससे हो तुझे एक नयी आस ज़िन्दगी.....




Wednesday, August 18, 2010

घरोंदे कि नीव तक हिल गयी.....


एक हँसती खेलती दुनिया किसी कि आज बदल दी गयी....
रस्मो रिवाज़ो के बंधन में जकड़ ली गयी...
तिनको से शुरू किया था....ख्वाबो का घरोंदा बुनना...
लेकिन चंद रिवाज़ो के बिच वो खुद गुम हो कर रह गयी.....

दिन बदला, राते बदली और उनके साथ पूरी तस्वीर भी बदल गयी....
हुई थी नुमाइश उसके सपनो की...लुट ली गयी दुनिया किसी के अरमानो की....
उसने देखा जब अपनों के उदास चेहरों को....तो हर सांस उसकी घुटन में बदल गयी....
आज पहली बार सोचा एक मासूम ने कि क्यों उसे ये जन्म मिला....
और अगर जन्म दिया भी तो क्यों उसकी खुशियाँ किसी और के हवाले कर दी गयी...

उसका यह दोष कम न था कि वो एक लड़की है....
लेकिन कहर बरपा उसके सीने पर जब उसने अपने माँ बाप के चेहरों को हर घड़ी......
अपनी आँखों से उदास होता देखा....
ऐसा क्यों हुआ ?
जब न थी कोई कमी उसमे.... आखिर क्यों
समाज के नियमो में वह पिस गयी....

रस्मो के बिच वो इस कदर फंसी कि
उसके घरोंदे की नीव तक हिल गयी.....

Tuesday, August 10, 2010

गुम होता बचपन.....


ये है हँसने मुस्कुराने के दिन मिलकर मौज उड़ाने के दिन....
आँखों में सपने और कंधो पर स्कूल बैग उठाने के दिन...
एक दिन रह में मिला था कोई पूछ रहा था के बचपन क्या है...
हमने कहा जहा हर दिन एक उम्मीद की किरने उगती है वो ही है बचपन के सुनहरे दिन....
इस बात पर हंस दिया कोई कहने लगा....
हा वो ही बचपन है न जो आज किताबो को छोड़ अपने नन्हे नन्हे हाथो से
दो जून की रोटियों का इंतज़ाम करता है...या फिर वो है जो दिन भर की थकन के बाद इस परेशानी में
सोता है की कल काम मिलेगा या नहीं... कहाँ गुम हो गया वो बचपन......
जो कटा करती थी किसी पेड़ की शाखों के साथ....
जब कभी अँधेरा हो तो सुबह की किरने भी आती थी माँ के आँचल से छन कर ....
जिन नन्हे कदमों को हमने देखा था, खेल खेल में लड़खड़ाते हुए....
आज वो ही बचपन गुम हो चला है समझदारी के जंगलो में....
जब कभी ग़लतियों में डांट मिला करती थी तो रोया करते थे....
बिना किसी की परवाह किये.....
लेकिन आज एक सांस का कतरा भी निकलता है....
समझदारी के पहरों तले... कहाँ गुम हो गए ऐ प्यारे बचपन...
हम इंतज़ार किया करते है....आओ इन समझदारों को भी कुछ अच्छी बात सिखाओ....
जो बात तो किया करते है हँसते हुए....पर चेहरों पर रखते है कई मुखोटे....
आजाओ फिर से सबको प्यार से रहना बता दो....
हम सबको खिलखिलाकर फिर से हंसना सिखा दो.....

Thursday, August 5, 2010

हर पल तन्हा कर चला जाता है....


किसी की याद आती है...
क्यों वो हर बात याद आती है...
सीने में छुपे दर्द को....
वो फिर से जगा जाती है....

क्यों हम फिर से उन राहों पर चल नहीं सकते...
क्या वो एक साथ ही हमारे लिए बाकी है....
क्यों वो मेरा प्यार मुझे छोड़ गया....
जब थी जरुरत तो भीड़ का हो गया...

ऐसे में उसी की ही याद क्यों आती है...
आज मिला है एक साथ नया...पर
डरते है की फिर वाही हाल न हो इस दिल का....
जो हुआ था एक मासूम के प्यार के साथ.....

सोच कर दिल घबराता है...
कई सवालों को दोहराता है...
क्यों वो एक साया बनकर...
मेरे साथ ही आता है....

ख़त्म कर दो उन यादो को....
जला के ख़ाक करदो उन जज्बातों को....
जो पहले धड़का करती थी...
किसी के नाम से ही....

पर आज दिल ने चाहा है....
किसी के साथ चलना....
जीवन राह पर आगे बढ़ना....
फिर क्यों वो यादे बनकर सताता है....
क्यों वो हर पल तन्हा कर चला जाता है....