जय हिन्द

Saturday, October 9, 2010

क्या लिखूं....


लिखना बहुत है लेकिन क्या लिखूं...
पाती लिखूं या किताब लिखूं...
दिल का सारा दर्द कहूँ या....
दिल के सारे अरमान लिखूं....
ज़िन्दगी अधूरे ख्वाबों की बारात है....
आज इसके हर पल का हिसाब लिखूं...
चंद लम्हों में ले गया वो साँसे किसी की....
फिर कैसे गुजरे दिन और रात लिखूं....
खुशियाँ क्या होती है ज़िन्दगी में.....
इन्हें चंद लम्हों की सौगात लिखूं....
दिल का धडकना लिखूं....
या इसे किसी का इंतज़ार लिखूं...
अश्क जो बहा करते है आँखों से उन्हें...
किसी की यादों का एहसास लिखूं...
इस कदर घुटती जाती है ज़िन्दगी किसी की....
कैसे बसर होते है किसी के लम्हात लिखूं...




6 comments:

  1. कभी-कभी इंसान के साथ ऐसा होता है कि उसके पास लिखने के लिए बहुत कुछ होता है किन्तु वह निर्णय नहीं ले पाता .
    बहुत अच्छा लिखा है .

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  2. ये कैसी बेनाम हकीकत.

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  3. bahut sahi but un logo ka kya jo likhana hi nahin jante.....ya bhagwan ne likhale ki kala na di hai....

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